CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ विरोध प्रदर्शन: SC ने कहा – शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में न लें; फिर भी दूसरे दिन सैकड़ों लोगों को ले जाया गया

बेंच ने इंटरनेट कनेक्टिविटी को सामान्य करने और "गैर-कानूनी" हिरासत पर रोक लगाने को कहा, खासकर उन लोगों के मामले में जो उन इलाकों से दूर शांतिपूर्ण विरोध के लिए इकट्ठा होते हैं जहां निषेधाज्ञा (prohibitory orders) लागू है।

D K Singh
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CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ विरोध प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल प्रमुख डी. थारा से अवमानना ​​याचिका पर जवाब मांगा। यह याचिका कोर्ट के 9 अक्टूबर के उस आदेश के कथित उल्लंघन पर दायर की गई थी, जिसमें शनिवार को CJP के विरोध प्रदर्शन (जिसमें CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग की गई थी) को रोकने के लिए दिल्ली में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बंद करने पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने में “किसी भी तरह से” बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।

ज़मीनी स्तर पर, लगभग 700 लोगों को हिरासत में लिया गया (पुलिस का दावा है कि 400 लोगों को), जिनमें से कई प्रदर्शन वाले इलाकों से काफी दूर थे, जबकि सड़कों पर शनिवार की तरह ही बैरिकेडिंग और ट्रैफिक पाबंदियां जारी रहीं।

रणनीति बदलते हुए प्रदर्शनकारियों ने अचानक और कम समय के सूचना पर छोटे-छोटे विरोध प्रदर्शन किए। ज़्यादातर गतिविधियां CP (कनॉट प्लेस) और उसके आसपास हुईं, जहाँ प्रदर्शनकारियों के छोटे-छोटे समूह आते रहे। उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

दोपहर करीब 2:30 बजे, ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के सदस्यों ने, जिनमें अध्यक्ष नेहा बोरा भी शामिल थीं, RK आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन के पास विरोध प्रदर्शन शुरू किया। जब उन्हें हिरासत में लेने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो बोरा और कुछ अन्य लोग अलग होकर कनॉट प्लेस की ओर भाग गए, जहाँ हिरासत में लिए जाने से पहले उन्होंने अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा।

शाम करीब 7 बजे, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के सदस्य CP में जमा हुए ताकि पुलिस की कथित ज्यादतियों, खासकर महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ, विरोध में महिलाओं का तिरंगा मार्च निकाल सकें। उन्हें हिरासत में ले लिया गया और बसों में ले जाया गया। SFI के महासचिव सृजन भट्टाचार्य ने कहा, “वे शाम 7 बजे महिलाओं को कैसे हिरासत में ले सकते हैं?”

बड़े पैमाने पर हिरासत में लेने की कार्रवाई – शनिवार को अनुमानित 7,000 लोग – रविवार को SC की असामान्य छुट्टी के दिन हुई सुनवाई में वकीलों की दलीलों का मुख्य विषय रही। दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा, “…हमारी राय है कि याचिकाकर्ताओं ने प्रथम दृष्टया मामला बनाया है। इसलिए, हम कथित अवमानना ​​करने वालों को नोटिस जारी करते हैं।” इसमें उनसे 13 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया।

supreme court

इंटरनेट कनेक्टिविटी सामान्य करें, शहर में लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करें: SC

हम हिरासत में लिए गए लोगों की भारी संख्या को समझते हैं। बेंच ने याचिकाकर्ताओं की बात सुनने के बाद कहा, “हमें सरकार से जवाब मांगना होगा।” याचिकाकर्ताओं में वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी, CPM सांसद एम.ए. बेबी, RJD सांसद मनोज झा और वकील शादान फरासत जैसे लोग शामिल थे। फरासत को शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के बाहर दूसरे वकीलों के साथ हिरासत में लिया गया था।

बेंच ने इंटरनेट कनेक्टिविटी को सामान्य करने और “गैर-कानूनी” हिरासत पर रोक लगाने को कहा, खासकर उन लोगों के मामले में जो उन इलाकों से दूर शांतिपूर्ण विरोध के लिए इकट्ठा होते हैं जहां निषेधाज्ञा (prohibitory orders) लागू है। बेंच ने कहा, “कोई गैर-कानूनी हिरासत नहीं होनी चाहिए, खासकर तब जब लोग शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के ऐसे इलाकों में इकट्ठा हों जहां BNS की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू नहीं है।”

9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को मेट्रो स्टेशनों को पूरी तरह बंद करने से रोका था, हालांकि यह भी कहा था कि हालात के हिसाब से ऑपरेशन को रेगुलेट किया जा सकता है। यह आदेश तब आया था जब DMRC ने कहा था कि 57 स्टेशन बंद किए जाएंगे; बाद में यह संख्या बदलकर 45 कर दी गई थी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 9 अक्टूबर के आदेश के उल्लंघन के आरोपों को गलत बताया और कहा कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चल रही है, हालांकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 303 में से 45 स्टेशन बंद किए गए थे। उन्होंने मेट्रो स्टेशन बंद होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि “शनिवार रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खुले हैं, ट्रेनें सामान्य रूप से चल रही हैं और इंटरनेट कनेक्शन भी बहाल कर दिया गया है।”

सुप्रीम कोर्ट ने शहर में लोगों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए भी निर्देश दिए, जो कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक नियमों के अधीन होंगे। साथ ही, बैरिकेड लगाने के फैसले की तुरंत समीक्षा करने को कहा ताकि कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आवाजाही आसान हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “वकीलों, पत्रकारों और दूसरे प्रोफेशनल्स को उनके काम करने में किसी भी तरह से रोका नहीं जाना चाहिए।” कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों के आसपास लगी निषेधाज्ञा को हटाने का भी निर्देश दिया ताकि मुकदमों से जुड़े लोगों और वकीलों को आसानी से आने-जाने में मदद मिल सके।

वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल के नेतृत्व में, सौ से अधिक वकीलों ने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता की पुरजोर निंदा की। उन्होंने अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पूरी तरह अनदेखी करते हुए मेट्रो और ट्रेन सेवाएं बंद रखे हुए हैं और उन इलाकों में भी प्रदर्शनकारियों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में ले रहे हैं जहां निषेधाज्ञा लागू नहीं है।

Kapil Sibal

सीनियर वकील और TMC सांसद मेनका गुरुस्वामी ने इस पूरी घटना को “अघोषित इमरजेंसी” बताया, जो इंदिरा गांधी (1975 में) द्वारा लगाई गई इमरजेंसी से भी बदतर थी।

सीनियर वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि… इंटरनेट बंद करने से बोलने की आज़ादी के मौलिक अधिकार को झटका लगा और विरोध प्रदर्शन में शामिल वकीलों को हिरासत में लेने का मुद्दा भी उठा। हिरासत में लिए गए सीनियर वकील फ़रासत ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उनके साथ बदसलूकी की गई और उन्हें ज़बरदस्ती पुलिस की गाड़ी में बिठाया गया। सीनियर वकील और TMC सांसद मेनका गुरुस्वामी ने इस पूरी घटना को “अघोषित इमरजेंसी” बताया, जो इंदिरा गांधी (1975 में) द्वारा लगाई गई इमरजेंसी से भी बदतर थी।

जब सिब्बल ने हालात की गंभीरता को देखते हुए रविवार को कोर्ट की कार्यवाही करने के लिए बेंच का शुक्रिया अदा किया, तो जस्टिस बागची ने कहा, “हम हमेशा देश की सेवा के लिए तैयार हैं।” बाद में जस्टिस बागची ने कहा, “हम जानते हैं कि इन घटनाओं ने आप लोगों (वकीलों) को बहुत प्रभावित किया है और हम किसी भी बात को हल्के में नहीं लेना चाहते।”

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D K Singh Editor In Chief at CMI Times News. Educationist, Education Strategist and Career Advisor.
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