Supreme Court का बड़ा फैसला: चुनाव आयोग का SIR अभियान वैध, शर्तों के साथ कर सकता है नागरिकता की जांच

इस विशेष अभियान (SIR) के तहत 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) में बड़े पैमाने पर फर्जी, दोहरे, मृत या संदिग्ध वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जो आंकड़ा 7.41 करोड़ तक पहुंच गया है।

CMI Times Web Desk
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Supreme Court का यह फैसला भारत की चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिहाज से एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला है। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने चुनाव आयोग (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान को पूरी तरह से वैध और संवैधानिक ठहराया है। इस खबर के सभी मुख्य पहलुओं और इसके गहरे राजनीतिक व कानूनी मायनों को आसान भाषा में समझते हैं:

1. Supreme Court का मुख्य फैसला क्या है?

Supreme Court ने साफ किया है कि “SIR अवैध नहीं है।” Supreme Court के अनुसार:

A) जांच का अधिकार: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA) की धारा 16 के तहत केवल भारतीय नागरिक ही वोट दे सकते हैं। इसलिए चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट तैयार करते समय यह जांचने का पूरा अधिकार है कि कोई व्यक्ति नागरिक है या नहीं।

B) लेकिन यह अंतिम फैसला नहीं: Supreme Court ने स्पष्ट रूप से ‘शर्त’ जोड़ी है कि चुनाव आयोग की यह जांच केवल “वोटर लिस्ट में नाम रखने या हटाने” के सीमित दायरे तक ही मान्य होगी। चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता को हमेशा के लिए छीन या खत्म नहीं कर रहा है, वह सिर्फ उसकी वोटिंग पात्रता तय कर रहा है।

C) पूर्वानुमान का सम्मान (Presumption of Favor): कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में हैं, उनके पक्ष में एक स्वाभाविक भरोसा होना चाहिए। उन्हें सीधे संदिग्ध मानकर नाम नहीं काटा जा सकता।

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2. ‘Doubtful Citizenship’ और 7.41 करोड़ नाम कटने का गणित

इस विशेष अभियान (SIR) के तहत 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) में बड़े पैमाने पर फर्जी, दोहरे, मृत या संदिग्ध वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जो आंकड़ा 7.41 करोड़ तक पहुंच गया है। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि यह “बैकडोर एनआरसी (NRC)” यानी पिछले दरवाजे से नागरिकता छीनने की कोशिश है। इस पर Supreme Court ने एक बड़ा सुरक्षा कवच (Safeguard) दिया है:

कोर्ट का सख्त निर्देश: जिन लोगों के नाम “संदेहास्पद नागरिकता” (Doubtful Citizenship) के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, चुनाव आयोग को 4 हफ्ते के भीतर उनके मामले सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority – गृह मंत्रालय या MHA) को भेजने होंगे।

3. अब हटाए गए वोटरों के पास क्या रास्ता है? जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं, उनकी नागरिकता पर अंतिम फैसला चुनाव आयोग नहीं बल्कि गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) द्वारा तय नियमों के तहत होगा:

चरणप्रक्रिया/रास्ता
दावे और आपत्ति (Claims & Objections)SIR प्रक्रिया के दौरान ही लोगों को जिला मजिस्ट्रेट (DM) या निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के सामने अपने दस्तावेज जमा करने का मौका मिलता है।
MHA वेरिफिकेशनजिन मामलों को आयोग आगे भेजेगा, उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय (Section 13, Citizenship Act) के तहत अपनी जन्मतिथि, जन्मस्थान और माता-पिता के भारतीय होने के सबूत देने होंगे।
प्रमाण पत्रजांच सही पाए जाने पर गृह मंत्रालय के अंडर-सेक्रेटरी रैंक के अधिकारी द्वारा ‘नागरिकता प्रमाण पत्र’ जारी किया जाएगा, जिसे दिखाकर नाम वापस जोड़ा जा सकेगा।
वोटर लिस्ट

4. यह विवाद शुरू क्यों हुआ था?

चुनाव आयोग ने पाया था कि पिछले 4 दशकों से कई इलाकों में गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था। तेजी से हुए शहरीकरण, पलायन (Migration) और फर्जी एंट्रीज की वजह से वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ियां थीं। आयोग ने इसे “मतदाता सूची का शुद्धिकरण” बताया ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Elections) कराए जा सकें।

वहीं, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ Supreme Court में याचिकाएं दायर की थीं। उनका तर्क था कि नागरिकता जांचना केवल ट्रिब्यूनल या केंद्र सरकार का काम है और इस प्रक्रिया से लाखों वास्तविक भारतीय नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

निष्कर्ष:

Supreme Court ने इस फैसले से एक बीच का रास्ता निकाला है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट साफ करने की शक्ति तो दे दी (जिससे निष्पक्ष चुनाव हो सकें), लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि आयोग किसी को हमेशा के लिए ‘विदेशी’ घोषित न कर दे। कटे हुए नामों की अंतिम कानूनी स्क्रूटनी अब गृह मंत्रालय के पाले में है।

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