Nitish Kumar Chief Minister of Bihar: नीतीश कुमार पर निर्भर, नेतृत्व का संकट: क्या बीजेपी के लिए आज (2025) अभेद्य दुर्ग है बिहार ?

राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की बिहार की सीमित नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं।

D K Singh
6 Min Read
Highlights
  • बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहाँ सत्ता की चाबी किसी एक दल के पास नहीं, बल्कि समीकरणों के पास है।
  • जातिगत समीकरण, नेतृत्व की विश्वसनीयता और गठबंधन की राजनीति; ये तीन धुरी हैं जिन पर बिहार की सत्ता घूमती है।
  • और इन तीनों धुरी में सबसे अहम नाम अभी भी नीतीश कुमार का ही है।

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) पर निर्भर, नेतृत्व का संकट: बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन की स्थिति पर अनेक राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की बिहार की सीमित नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। क्या भाजपा नेतृत्व की कमी से जूझ रही है? इस लेख में, मैं राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर इसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ।

बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहाँ सत्ता की चाबी किसी एक दल के पास नहीं, बल्कि समीकरणों के पास है। जातिगत समीकरण, नेतृत्व की विश्वसनीयता और गठबंधन की राजनीति; ये तीन धुरी हैं जिन पर बिहार की सत्ता घूमती है। और इन तीनों धुरी में सबसे अहम नाम अभी भी नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का ही है।

1. नीतीश कुमार (Nitish Kumar): सत्ता का केंद्र बिंदु

दो दशक से ज़्यादा समय बीत चुका है, लेकिन बिहार की राजनीति आज भी एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है – नीतीश कुमार। चाहे वह मुख्यमंत्री हों या कुछ महीनों के लिए विपक्ष में बैठे हों, वह हमेशा “राजा” नहीं तो “किंगमेकर” ज़रूर रहे हैं। बिहार में अगर कोई भी पार्टी सरकार बनाना चाहती है, तो उसे या तो नीतीश कुमार के साथ गठबंधन करना पड़ता है या फिर उनके रास्ते में रोड़ा अटकाने की रणनीति बनानी पड़ती है।

यही नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की पहचान रही है – वह हर दौर में अपने लिए “राजनीतिक ऑक्सीजन” निकालते हैं। कभी भाजपा के साथ, कभी राजद के साथ, कभी तीसरे मोर्चे की बात करके – नीतीश जी (Nitish Kumar) हमेशा से ही इस खेल में बने रहे हैं। यही कारण है कि आज भी न तो विपक्ष के पास और न ही भाजपा के पास उनका कोई विकल्प है।

बिहार

2. भाजपा का संकट: मुख्यमंत्री के लिए लोकप्रिय नेता नहीं, सिर्फ़ संगठन

बिहार में मज़बूत संगठन, जातिगत गतिशीलता की गहरी समझ और अपने राष्ट्रीय नेतृत्व की मज़बूती के बावजूद, भाजपा एक पहलू में पिछड़ रही है – स्थानीय नेतृत्व। सवाल यह है:

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के अलावा भाजपा का चेहरा कौन होगा?

+ गिरिराज सिंह, नित्यानंद राय, सम्राट चौधरी, मंगल पांडे – कई नाम हैं, लेकिन कोई भी लोकप्रिय नेता नहीं है।

+ स्थानीय जुड़ाव, जो बिहार की राजनीति का मूल सार है, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से गायब है।

+ नीतीश कुमार के नेतृत्व में, भाजपा हमेशा एक “जूनियर पार्टनर” की भूमिका में रही, और जब वह अलग हुई, तो उसे जनादेश नहीं मिला।

+ 2015 में, भाजपा लालू-नीतीश गठबंधन से बुरी तरह हार गई,

और 2020 में भी, नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की “घटती लोकप्रियता” के बावजूद, भाजपा अपने दम पर बहुमत से चूक गई। यह बिहार में भाजपा की सीमाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, जो नीतीश कुमार की उपस्थिति से निर्धारित होती है।

3. नेतृत्व संकट: विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों में

+ नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जितने मज़बूत दिख रहे हैं, उनके आसपास का राजनीतिक परिदृश्य उतना ही कमज़ोर होता जा रहा है।

+ तेजस्वी यादव अब राजद में एक प्रमुख हस्ती हैं, लेकिन उनका राजनीतिक करियर अभी तक “लालू की विरासत” से मुक्त नहीं हो पाया है।

+ दूसरी ओर, भाजपा राज्य में अपने दम पर सत्ता हथियाने की तैयारी कर रही है, लेकिन “मुख्यमंत्री पद का चेहरा” तय नहीं कर पा रही है। ऐसी स्थिति में, नीतीश जी को न तो पूरी तरह हाशिए पर धकेला जा सकता है और न ही केंद्र से पूरी तरह हटाया जा सकता है।

4. जातिगत गणित: भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती

+ बिहार की राजनीति केवल विकास या विचारधारा पर नहीं, बल्कि जातिगत गठबंधनों पर टिकी है।

+ भाजपा का पारंपरिक आधार – उच्च जातियाँ, अति पिछड़ा वर्ग और कुछ शहरी वोट – एक सीमित क्षेत्र बनाते हैं।

+ इस बीच, यादव-मुस्लिम समीकरण राजद का स्थायी वोट बैंक है।

+ इन दोनों के बीच की “कुंजी” कुर्मी-कायस्थ और अन्य पिछड़ा वर्ग है – जो अक्सर नीतीश कुमार के साथ खड़ा होता है। जब तक भाजपा इस सामाजिक समीकरण को तोड़ नहीं पाती, बिहार उसके लिए एक “अभेद्य किला” बना रहेगा।

5. 2025 बिहार विधान सभा की ओर: पुराना सवाल

आगामी चुनावों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा:

क्या नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के बिना भाजपा सत्ता तक पहुँच सकती है? या उसे एक बार फिर “गठबंधन की राजनीति” का सहारा लेना चाहिए? भले ही उनकी उम्र ज़्यादा हो, लेकिन उनके बिना बिहार की राजनीति अकल्पनीय है। वे विरोधियों के लिए समस्या हैं, जिन्हें सुलझाना मुश्किल है, फिर भी वे भाजपा का सबसे बड़ा सहारा बने हुए हैं।

निष्कर्ष: बिहार नीतीश-आश्रित राजनीति का एक उदाहरण बना हुआ है।

+ भाजपा के पास ताकत है, लेकिन चेहरा नहीं।

+ राजद के पास चेहरा है, लेकिन विश्वसनीयता नहीं।

+ और नीतीश के पास दोनों हैं – अनुभव और स्वीकार्यता।

जब तक यह समीकरण नहीं बदलता, बिहार भाजपा के लिए एक अभेद्य किला बना रहेगा – जहाँ जीत की कुंजी अभी भी उसी के हाथ में है जिसे कभी “खत्म” माना जाता था: नीतीश कुमार।

Also Read: जन नायक कर्पूरी ठाकुर की विरासत: समानता, आरक्षण और ईमानदार नेतृत्व, जन नायक का दृष्टिकोण आज क्यों मायने रखता है?

Share This Article
Follow:
D K Singh Editor In Chief at CMI Times News. Educationist, Education Strategist and Career Advisor.
Leave a Comment